[5 workers burnt to death, incl. woman worker with her child on her chest, 16 jumped from third floor to various serious injuries – in Real Paints factory fire on 18 March 2.30am, in Rai industrial area, Sonepat, Haryana. But Nothing in the news. This is not some random incident either: workers almost work as bonded labourers for a pittance: much below min. wage at 4500/m for women workers, 6k/m for men. In the entire area, no ESI, no PF, no labour laws, no Union, only ‘acche din‘. Find below a fact-finding report in Hindi done by members of four workers organisations who visited the area on 20 March. An English and Bengali translations are also available below. -Ed]

हरियाणा के सोनीपत के राई औद्योगिक क्षेत्र में रियेल पेंट फैक्ट्री में आग लगने से कई मज़दूरों की दर्दनाक मृत्यु हो गयी।सरकारी सूत्रों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 4 बतायी गयी है। इस कारखाने में अग्निकाण्ड का जायजा लेने के लिये इंक़लाबी मज़दूर केंद्र व नागरिक अखबार के प्रतिनिधि, जन संघर्ष मंच ,हरियाणा , मज़दूर पत्रिका व ग्रामीण मज़दूर यूनियन ,बिहार के प्रतिनिधियों की एक तथ्यान्वेषी टीम दिनांक 20-3-18 को सोनीपत के राई औद्योगिक क्षेत्र पहुंची।उक्त संगठन मासा(मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान) के घटक संगठन भी हैं। टीम द्वारा फैक्ट्री का मुआयना एवम घटनास्थल के पास की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों से बातचीत कर निम्न रिपोर्ट तैयार की गई।

राई औद्योगिक क्षेत्र हरियाणा के सोनीपत जिले में स्थित है। यह दिल्लीI और सोनीपत के बीच दिल्ली (ISBT कश्मीरी गेट) से क़रीब 47 किलोमीटर की दूरी पर जी.टी.रोड पर स्थित है। जिस फैक्ट्री में आग लगी वह राई औद्योगिक क्षेत्र के प्लाट नंबर 291,292 व293 में स्थित है।इस फैक्ट्री में गाड़ियों का पेंट बनता था। 20 मार्च को तथ्यान्वेषी टीम जब घटनास्थल पर पहुंची तो फैक्ट्री में से तब भी धुआं उठ रहा था।

वहां फैक्ट्री के सामने कुछ मज़दूर खड़े थे जो आसपास की फैक्टरियों में काम करते थे। और पास ही में कुर्सी डाले तीन पुलिसकर्मी व पंजाब केसरी के एक पत्रकार व खुफिया विभाग के लोग भी मौजूद थे। मज़दूरों से बात करने पर पता चला कि फैक्ट्री में आग 17 -18 मार्च की रात को लगभग ढाई बजे लगी। फैक्ट्री में पेंट ,थिनर बनता था जो अति ज्वलनशील होता है। फैक्टरी में भारी मात्रा में तैयार पेंट,थिनर व साल्वेंट रखा हुआ था । फैक्टरी में 34 मज़दूर काम करते थे ।आग लगते वक्त फैक्ट्री में कितने मज़दूर काम कर रहे थे इसकी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी ।आस पास के मज़दूरों के अनुसार 5 लोगों की मृत्यु हो चुकी है जबकि पुलिस और खुफिया विभाग वाला 4 लोगों की मौत की बात कह रहे थे। मज़दूरों ने बताया कि 16 मज़दूरों ने फैक्ट्री की तीसरी मंजिल से कूदकर अपनी जान बचाई ।इनमें से कई झुलस गए और एक महिला मज़दूर की रीढ़ की हड्डी टूट गयी। बाकी मज़दूरों की स्थिति भी गंभीर है। इन्हें इलाज के लिए पी .जी .आई .रोहतक व खानपुर कलां भेजा गया है।

हमारे सामने फैक्ट्री का दरवाजा खुला हुआ था। दरवाजे के गेट की टीन गर्मी से पिघलकर लटक गई थीं। अंदर पेन्ट के डिब्बों का ढेर दिखाई दे रहा था। मज़दूरों ने बताया कि एक मज़दूर का जला शव एक बड़े पेंट के डिब्बे से चिपका हुआ मिला तो एक मज़दूर का जला हुआ कंकाल सीढ़ियों के पास से बरामद हुआ। दिल्ली के बवाना की तरह यहां भी गेट के ऊपर लोहे के ग्रिल की जाली थी। फैक्ट्री का एक ही गेट था जो बन्द रहता था ।अति ज्वलनशील पदार्थों का प्रयोग व निर्माण होने के बावजूद फैक्ट्री में एक ही गेट था। फैक्ट्री एक तरह की जेल थी जिसमे मज़दूरों से एक तरह से बन्धुआ मज़दूरी करवाई जा रही थी वह भी उनकी जान को गंभीर संकट या जोखिम में डालकर।बेसमेंट में केमिकल रखने का बड़ा 15 हजार लीटर क्षमता का टेंक था।

फैक्ट्री तीन मंजिला थी जिसमें मज़दूर व उनके परिवार भी रहते थे। उत्पादन दो मंजिल तक होता था।दूसरी मंजिल पर 5 मजदूर रहते थे। तीसरी मंजिल पर भी कमरे बने थे जिसमें 16 लोग रहते थे। इन्हीं में से एक कमरे में रहने वाली एक महिला अपने बच्चे को सीने से चिपकाई जल कर मर गयी।एक मज़दूर के मलवे में अभी भी दबे होने की आशंका है। आग लगने और सुरक्षा मानकों का खुला उल्लंघन साफ दिखाई दे रहा था । नियमानुसार फैक्ट्री पलाट की 40% जगह आगे व पीछे खाली होनी चाहिए परन्तु यह जगह लोहे की मोटी चद्दरों से शैड बनाकर ढकी थी ।ऐसा ही आसपास की अन्य फैक्टरियों में दिख रहा था ।फैक्ट्री छतों पर जनरेटर व कंप्रेसर दिखाई दे रहे थे जो कभी भी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। मुनाफे के अर्थशास्त्र में मानवीय जीवन का क्या मूल्य होता है यहां स्पष्ट दिखायी दे रहा था।

राई औद्योगिक क्षेत्र 1995 -1996 में अस्तित्व में आया था। उस समय यहां 1200-1500 रुपये मज़दूरी होती थी। मालिकान व प्रबन्धन द्वारा स्थानीय लोगों को भरती नहीं किया जाता है।ज्यादातर मज़दूर बिहार व उत्तर प्रदेश से हैं। राई औद्योगिक क्षेत्र में लघु उद्योग की इकाइयां है। यहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सबसे कम मज़दूरी मिलती है । पुरुष मज़दूरों को 8 घंटे के 6 हज़ार व महिला मज़दूरों को 4.5 हज़ार रुपये ही तनख्वाह मिलती है जबकि हरियाणा सरकार की नवीनतम घोषित न्यूनतम मजदूरी अकुशल मज़दूर के लिए 9600 ,अर्ध कुशल के लिए 10286, कुशल के7ज लिए 11429 व उच्च कुशल के लिए 12900 रुपये के करीब है।

मज़दूरों ने बताया कि हेल्पर 12 घण्टे काम करने के बाद 9-10 हज़ार रूपये कमा पाते हैं।मज़दूरों ने बताया कि इलाके में केवल 20 प्रतिशत फैक्टरियों में ही ई.एस.आई.की सुविधा उपलब्ध है।इलाके में किसी फैक्ट्री में यूनियन नहीं है। वैसे भी केंद्र सरकार जिन कथित श्रम सुधारों द्वारा श्रम कानूनों को खत्म करने की साज़िश रच रही है उन्हें हरियाणा सहित कई भाजपा शासित राज्य सरकारों ने पहले ही पूंजीपतियों के हित में लागू कर दिया है। इस तरह हरियाणा में पूजीपतियों को मज़दूरों का किसी भी हद तक जाकर शोषण करने की छूट मिली हुई है। उनको न श्रम कानूनों की परवाह है न शासन का डर। मज़दूर आंदोलन या मज़दूरों का एक संयुक्त प्रतिरोध ही स्थिति में कोई सुधार ला सकता है।

पुलिस कर्मियों ने जिनमें एक सब इंपेक्टर थे घटना के बारे में पूछे जाने पर कोई बात करने से हमें मना कर दिया।इतना ही पता चला कि मालिक कोई गुलशन माटा नाम के व्यक्ति हैं जो फरार चल रहे हैं। मालिक गुलशन माटा,उसके बेटे अभिषेक माटा ,मैनेजर मीनू तथा 3 सुपरवाइजर पर लापरवाही के चलते गैरइरादतन हत्या का मुकदमा 304-A लगाया गया है। मज़दूरों पर आए दिन एक से बढ़कर एक- हत्या, गैंगस्टर व राजद्रोह ,कठोर कारावास – जैसे मुकदमे लगाने वाले पुलिस प्रशासन के लोग मालिकों व उनके कारिन्दों के प्रति इतने उदार क्यों हो जाते है !

फिलहाल राज्य सरकार ने मृतकों के लिए 5 लाख व घायलों के लिए 1 लाख रूपये की घोषणा की हैं।लेकिन जो मज़दूर पूरी जिन्दगी के लिए अपाहिज हो गए उन्हें एक लाख के मुआवजे से क्या फर्क पड़ेगा।

22मार्च को रोहतक से एक साथी के हवाले से समाचार आया है कि जो 8 घायल व झुलसे हुए मजदूर पी.जी.आई. में उपचाराधीन हैं उनकी सरकार व प्रशासन सुध नहीं ले रहे हैं। सरकार की ओर से घायलों का इलाज करवाने की हवाई घोषणा मात्र की गई है । गम्भीर रूप से घायल एक मज़दूर को पी.जी.आई. रोहतक से दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल के लिए रैफर कर दिया गया है।

राई औद्योगिक क्षेत्र में कारखानों की स्थिति व काम की परिस्थतियों को देखकर हर कोई यही कहेगा कि ये मौतें महज दुर्घटनाएं नहीं बल्कि मुनाफे के लालच के मद्देनज़र जान बूझकर की गई हत्याएं हैं।

तथ्यान्वेषी टीम में नागरिक अखबार व इमके से साथी नगेन्द्र ,जन संघर्ष मंच हरियाणा से साथी सोमनाथ व साथी मेहर सिंह तथा मज़दूर पत्रिका से साथी रविशंकर शामिल थे।

****

Fiery Death of Workers in Real Paint Factory in Rai Sonepat : A Fact Finding Report

[Translated by Manali]

Several workers met painful death due to a fire which broke out in Real Paint Factory in the Rai industrial estate in Spnapat Haryana. According to official sources the number of casualty in the accident is four. A fact finding team constituting of representatives of Inqilaabi Mazdoor Kendra and Nagrik Akhbaar, Jan Sangharsh Manch Haryana, Mazdoor Patrika and Grameen Mazdoor Union, Bihar went to the site of the accident on 20th March, 2018. The team prepared the following report based on their physical inspection of the site and conversations with workers working in nearby units.

The Rai industrial estate is situated in Sonepat district of Haryana. It is on the G T road, between Delhi and Sonepat, around 47 kms from ISBT Kashmiri gate Delhi. The factory which caught fire was situated on plot number 291. 292, 293 on Rai industrial estate. The factory used to manufacture industrial paint for automobiles. On 20th March when the investigating team reached the site, smoke was still emanating from the factory.

There were some workers standing in front of the factory who worked in factories nearby. Three policemen were seated on chairs along with a journalist from Punjab Kesari and some persons from the Intelligence Bureau. The workers informed us that the fire broke out on the night (17th – 18th March) around 2.30 am. The factory used to produce paint thinner which is extremely inflammable and that there was a huge stock of paint thinner and solvent inside the factory. Thirty four workers worked in the factory but there is no conclusive information as to how many were working when the fire broke out. According to people nearby, five persons have already died due to the accident while police and intelligence report claim four deaths. The workers told us that sixteen workers saved themselves by jumping from the third floor of the factory. Many of them got charred, one of the female workers broke her spine and the rest too are in very critical condition. They have been sent to PGI Rohtak and Khanpur Kalan for treatment.

When we reached the site we found that the main door of the factory was unlocked and open – in fact the metal door had melted and was completely deshaped indicating the intensity of heat the fire would have caused. We could see a pile of paint cans inside. The workers informed us that one of the worker’s dead body was found stuck to a can of paint and another’s charred skeleton was found near the stairs. Like the factory in Bawana Delhi there was a metal grill in front of the gate and the factory premises had only one exit which used to be kept locked. In spite of producing highly inflammable substance the factory had only one gate. The factory seemed like a prison where the workers were made to work like indentured labour, and that too at a grave risk to their lives – there were no safety norms followed. The basement had an enormous tank to store chemicals – the storage capacity was 15000 litres.

The factory was a three-storey building and the workers and their families lived in the same building. Production facilities were in the first two floors (ground floor and the first floor) – 5 workers used to reside on the first floor and 16 people lived on the third floor. A woman and her child got burnt to death in one of the rooms on the third floor – she was clutching her child to her breast when they died. One of the workers is still feared to be trapped under the debris. It was evident from the remains that none of the mandatory safety norms were followed in the factory. According to the norms at least 40 percent of the space of the plot in which a factory is constructed (around the building) has to be kept free. In this case there were thick sheets of iron covering the space, the same as in every other factory building in the vicinity. All the factories had generators and compressors on their roofs, which could lead to a serious mishap at any time. The real cost of human lives in profit driven economy was evident from the accident we had gone to investigate and those waiting to happen.

Rai industrial estate was established in 1995-1996. At that time the going wages was Rs 1200 to Rs 1500 a month. The employers on principle did not employ local workers; most of them were migrants from Bihar and Uttar Pradesh. The Rai industrial estate mostly constitutes of tiny units and the workers are given the lowest wages in the entire Delhi NCR region. On an average a male worker earns Rs 8000 per month for an eight hour shift while female workers earn Rs 4500/-, way below the legal minimum wages declared by the Haryana government which is Rs 9600/- for unskilled workers, Rs 10826/- for semi-skilled workers, Rs 11429 for skilled workers and Rs 12900/- for highly skilled workers.

Workers informed us that helpers could manage a monthly wages of Rs 9000-10000 by working 12- hour shifts. Further only 20 percent of the factories in the area had registered their workers for ESI facilities. In any case the labour laws, which the central government is conspiring to dismantle in the interests of the capitalist class in the name of labour reforms, have already been implemented in the BJP ruled states including Haryana. Thus in Haryana the capitalists have been offered complete freedom to exploit their workers unhindered by either any legal constraints or any sanctions by the government. The situation is not likely to improve unless there is a collective resistance by the workers.

The police officials present (including a sub-inspector) refused to answer our queries on the case. The only information we could gather was that the owner Mr Gulshan Maata was on the run. The owner Gulshan Mata, his son Abhishek Maata, and the manager Meenu and three supervisors have been booked under section 304 A of the IPC – causing death due to negligence. It is telling that while the police routinely slap workers with much more serious charges including murder, treason, sedition, Gangster Act, etc., they seemed to get all soft and generous when it comes to the crimes of the owners and their henchmen.

The state government has announced compensation of Rs 5 lakhs for the dead, and Rs 1 lakh for the injured. Though one wonders what difference would a lakh rupees make to a worker (or his family) who has been rendered permanently invalid.

On 22nd March, we came to know through an associate, that the government and the administration have not been following up with the 8 severely burned workers admitted in PGI Rohtak. The announcement made by the government of ensuring proper medical attention to the injured workers was all in the air. One of the workers in a very critical condition has been referred to Safdarjung Hospital New Delhi for treatment.

The state of the factories in Rai industrial estate and the work conditions would lead anyone to conclude that the painful deaths of these workers were not due to an accident but were wilful murders in ruthless pursuit of profits.

Fact finding team constituted of – Nagendra representating of Inqilaabi Mazdoor Kendra and Nagrik Akhbaar, Somenath and Meher Singh representing Jan Sangharsh Manch Haryana, and Ravishankar of Mazdoor Patrika and Grameen Mazdoor Union, Bihar

****

#WORKERSDEATH #Rai_Industrial_Area #RealPaintFactory

৫ জন শ্রমিককে পুড়িয়ে মারা হয়েছে। তাঁদের মধ্যে একজন মহিলা, বুকে সন্তানকে জড়িয়ে। আগুন থেকে বাঁচতে তিনতলা থেকে ঝাঁপ দিয়ে ১৬ জন গুরুতর ভাবে জখম হয়েছেন। ১৮ মার্চের ঘটনা। রিয়েল পেইন্টস ফ্যাক্টরিতে আগুন লাগে রাত আড়াইটের সময়। ঘটনাস্থল রাই শিল্পাঞ্চল, সোনেপত, হরিয়ানা। এই ভয়াবহ ঘটনার কোনও খবর কোথাও বেরোয়নি। নিছক দুর্ঘটনা নয়। শ্রমিকরা এখানে কোনোরকম সামাজিক সুরক্ষা ছাড়া প্রায় বন্ধুয়া মজদুরের মত কাজ করতে বাধ্য। মহিলারা মাসে ৪৫০০ টাকা, পুরুষেরা ৬০০০ টাকা, নামমাত্র মজুরিতে। ইএসআই নেই, প্রভিডেন্ট ফান্ড নেই। শ্রম আইন নেই। আছে স্রেফ ‘আচ্ছে দিন’।

(২০ তারিখ চারটি শ্রমিক সংগঠন এলাকায় গিয়ে তথ্যানুসন্ধান করেন। তার রিপোর্টটা হিন্দি থেকে ভাষান্তর করে দিলাম। – কস্তুরী।)

Source: https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10215580497966639&id=1266042742

হরিয়ানার সোনেপতের রাই শিল্পাঞ্চলের রিয়েল পেইন্ট ফ্যাক্টরিতে আগুন লেগে কয়েকজন শ্রমিকের মর্মান্তিক মৃত্যু ঘটেছে। সরকারি সূত্রে মৃতের সংখ্যা ৪ বলা হয়েছে। এই কারখানায় অগ্নিকান্ডের ঘটনার খোঁজ খবর করতে ইনকিলাবি মজদুর কেন্দ্র, নাগরিক সংবাদপত্রের প্রতিনিধি, জন সংঘর্ষ মঞ্চ হরিয়ানা, মজদুর পত্রিকা ও গ্রামীণ মজদুর ইউনিয়ন বিহারের প্রতিনিধিদের একটি তথ্যানুসন্ধানী টিম ২০/৩/১৮ তারিখে রাই শিল্পাঞ্চলে পৌঁছয়। এই সংগঠন গুলো মজদুর অধিকার সংঘর্ষ অভিযান নামক যৌথ মঞ্চের অংশ। টিম ফ্যাক্টরি ও ঘটনাস্থল ঘুরে দেখে ও আশেপাশের ফ্যাক্টরিগুলোয় কাজ করা শ্রমিকদের সাথে কথা বলে এই রিপোর্ট লিখেছে।

হরিয়ানার সোনিপত জেলায় অবস্থিত রাই শিল্পাঞ্চল দিল্লীর কাশ্মীরী গেট এলাকা থেকে সোনিপতের দিকে যেতে প্রায় ৪৭ কিলোমিটার দূরে, জিটি রোডের ওপর অবস্থিত। যে কারখানায় আগুন লাগে সেটি রাই শিল্পাঞ্চলের ২৯১, ২৯২ ও ২৯৩ নম্বর প্ল্যান্টের অন্তর্গত। এই কারখানায় গাড়ির পেইন্ট তৈরি হয়। ২০ তারিখে যখন তথ্যানুসন্ধানী টিম ঘটনাস্থলে পৌঁছয় তখনও কারখানা থেকে ধোঁয়া বেরোচ্ছিল।

কারখানার গেটে আশেপাশের ফ্যাক্টরিগুলোয় কাজ করেন এমন কয়েকজন শ্রমিক দাঁড়িয়ে ছিলেন। পাশেই চেয়ারে বসে ছিল তিনজন পুলিশ, পঞ্জাব কেশরী কাগজের এক রিপোর্টার আর গোয়েন্দা বিভাগের কিছু লোক। শ্রমিকদের সাথে কথা বলে জানা গেল যে ১৭-১৮ মার্চের রাতে প্রায় আড়াইটের সময় ওই ফ্যাক্টরিতে আগুন লাগে। ফ্যাক্টরিতে যে পেইন্ট, থিনার ইত্যাদি তৈরি হত সেগুলো অতিদাহ্য পদার্থ। তৈরি হয়ে যাওয়া পেইন্ট, থিনার ও সলভেন্ট ভালো পরিমাণেই মজুত ছিল কারখানায়। ফ্যাক্টরিতে ৩৪ জন শ্রমিক কাজ করতেন। আগুন লাগার সময়ে তাঁদের মধ্যে কতজন সেখানে উপস্থিত ছিলেন সেটা সঠিকভাবে জানা যায় নি। আশপাশের ফ্যাক্টরির শ্রমিকদের বয়ান অনুসারে ৫ জনের মৃত্যু হয়েছে। অথচ পুলিশ ও গোয়েন্দারা ৪ জনের মৃত্যু হয়েছে এমন বলছে। শ্রমিকরা এও জানালেন যে ওই কারখানার ১৬ জন শ্রমিক ফ্যাক্টরির তিনতলা থেকে ঝাঁপ দিয়ে প্রাণে বেঁচেছেন। তাঁদের মধ্যে অনেকের দেহ ঝলসে গেছে। একজন মহিলা শ্রমিকের মেরুদণ্ডের হাড় ভেঙে গেছে। বাকিদের অবস্থাও গুরুতর। এই শ্রমিকদের সবাইকে রোহতকের পিজিআই হাসপাতাল ও খানপুর কলানে চিকিৎসার জন্য নিয়ে যাওয়া হয়েছে।

আমাদের সামনে কারখানার দরজা খোলা ছিল। গেটের টিন তাপে গলে গিয়ে গেট থেকে ঝুলছিল। ভেতরে রঙের টিনগুলো ডাঁই করে রাখা ছিল। একজন শ্রমিক জানালেন যে ওরকম একটা বড় রঙের টিনের সাথে লেপটে যাওয়া এক শ্রমিকের পোড়া দেহ উদ্ধার হয়েছে। আর একজন শ্রমিকের পোড়া কঙ্কাল পাওয়া গেছে সিঁড়ির কাছে। দিল্লির বওয়ানার মত এখানেও গেটের ওপর লোহার গ্রিল দিয়ে ঢাকা। ফ্যাক্টরির একমাত্র গেটটা বন্ধ ছিল। এত পরিমাণে অতিদাহ্য পদার্থ ওই কারাখানায় ব্যবহার ও তৈরি হওয়া সত্ত্বেও কারখানায় মাত্র একটাই গেট ছিল। এক কথায় বলতে গেলে ফ্যাক্টরিটা একটা জেলের মত ছিল যেখানে শ্রমিকরা প্রাণের ঝুঁকি নিয়ে কার্যত বন্ধুয়া মজদুরের মতই বন্দী অবস্থায় ছিলেন। কারখানার বেসমেন্টে ১৫ হাজার লিটারের কেমিক্যাল ধরে এমন বড় ট্যাঙ্ক ছিল।

তিনতলা কারখানাটার মধ্যে শ্রমিকরা তাঁদের পরিবার নিয়ে থাকতেন। নিচের দুটো তলায় উৎপাদন হত। দোতলায় ৫ জন শ্রমিক থাকতেনও। তিন তলায় কিছু ঘর ছিল যেখানে ১৬ জন থাকতেন। এই ঘরগুলোর একটিতেই এক মহিলা তাঁর সন্তানকে বুকে চেপে ধরে ওই অবস্থাতেই আগুনে পুড়ে মারা গেছেন। একজন শ্রমিক এখনো ওই পোড়া ছাইয়ের স্তূপের মধ্যে চাপা পড়ে রয়েছেন বলে আশঙ্কা। আমরা পরিষ্কার দেখলাম কারখানায় কোনও রকম শ্রমিক-সুরক্ষা বা অগ্নিনির্বাপন ব্যবস্থার নামগন্ধ নেই, যা শ্রমিকের সুরক্ষা আইনের সটান লঙ্ঘন। নিয়ম অনুযায়ী ফ্যাক্টরি এলাকার ৪০% শতাংশ জায়গা সামনে পেছনে মিলিয়ে খালি রাখার কথা। কিন্তু এই কারখানাটা মোটা লোহার শিটের শেড দিয়ে ঢাকা। আশেপাশের ফ্যাক্টরিগুলোও তথৈবচ। ফ্যাক্টরি গুলোর ছাতে জেনেরেটর ও কম্প্রেসর দেখা যাচ্ছিল। সে কোনও সময় এগুলোও দুর্ঘটনার কারণ হতে পারে। মুনাফা কামানোর অর্থশাস্ত্রের হিসেবে মানুষের জীবনের মূল্য যে কতটা সেটা চোখের সামনে স্পষ্ট হচ্ছিল।

১৯৯৫-১৯৯৬ সাল নাগাদ রাই শিল্পাঞ্চলের পত্তন। তখন এই অঞ্চলে ১২০০-১৫০০ টাকা মজুরি ছিল। কারখানার মালিক ও ম্যানেজাররা স্থানীয় মানুষকে কাজ দিত না। বেশির ভাগ শ্রমিক আসতেন বিহার ও উত্তর প্রদেশ থেকে। এই শিল্পাঞ্চলে মূলত লঘু শিল্প-উদ্যোগগুলো রয়েছে। এই শিল্পাঞ্চলে দিল্লি এনসিআর এলাকার মধ্যে সবথেকে কম মজুরি দেওয়া হয়। দৈনিক ৮ ঘন্টা কাজের জন্য পুরুষ শ্রমিককে মাসে ৬ হাজার আর মহিলা শ্রমিককে সাড়ে ৪ হাজার টাকা মজুরি দেওয়া হয়! অথচ হরিয়ানা সরকারের সাম্প্রতিক ঘোষণা অনুসারে ‘অদক্ষ; শ্রমিকের ন্যূনতম মজুরি মাসে ৯৬০০ টাকা, ‘অর্ধ-দক্ষ’ শ্রমিকের ন্যূনতম মজুরি মাসিক ১০২৮৬ টাকা, ‘দক্ষ’ শ্রমিকের মাসিক ন্যূনতম মজুরি ১১৪২৯ টাকা ও ‘উচ্চ দক্ষতা সম্পন্ন’ শ্রমিকের মাসিক ন্যূনতম মজুরি ধার্য করা আছে ১২৯০০ টাকা!

শ্রমিকরা জানালেন যে হেল্পাররা ১২ ঘন্টা কাজ করেও মাত্র ৯-১০ হাজার টাকা মজুরি পান। তাঁরা জানালেন, যে শিল্পাঞ্চলে একশোর মধ্যে মাত্র কুড়ি শতাংশ ফ্যাক্টরিতে ইএসআই এর (মেডিক্যাল) শ্রমিক-সুরক্ষা প্রকল্পের সুযোগ আছে। শিল্পাঞ্চলের একটি ফ্যাক্টরিতেও শ্রমিক ইউনিয়ন নেই! এটা জানা কথা যে কেন্দ্রীয় সরকার যে সব তথাকথিত ‘শ্রম সংস্কার’ এর নাম করে শ্রম-আইনগুলোকে ধ্বংস করার পরিকল্পনা করেছে, সেগুলো ইতিমধ্যেই তারা পুঁজিপতিদের হিতার্থে সেগুলো বিজেপি-শাসিত রাজ্যগুলো (যার মধ্যে হরিয়ানাও পড়ে) তে চালু করে দিয়েছে। ফলে হরিয়ানায় পুঁজিমালিকরা শ্রমিকদের যেভাবে খুশি শোষণ করতে পারে, সরকার তাদের সে ক্ষমতা দিয়েই দিয়েছে। শ্রম-আইনের পরোয়া করার কোনও দায় তাদের নেই। প্রশাসনের দিক থেকেও কোনও চাপ নেই। এই দম বন্ধ করা অবস্থার সামান্যতম পরিবর্তনও একমাত্র শ্রমিক আন্দোলন অথবা শ্রমিকদের যৌথ প্রতিরোধের মাধ্যমেই সম্ভব।

ওখানে উপস্থিত পুলিশ কর্মীদের মধ্যে একজন সাব ইন্সপেক্টর ছিল। তাকে জিজ্ঞাসাবাদ করায় সে আমাদের কারুর সাথে কথাবার্তা চালাতে বারণ করে। শুধু এইটুকু জানা গেল যে গুলশন মাটা নামের এক ব্যক্তি ওই কারখানার মালিক, এবং সে নাকি ফেরার! মালিক গুলশন মাটা, তার ছেলে অভিষেক মাটা, ম্যানেজার মিনু ও তিন জন সুপারভাইজারের নামে ৩০৪-এ ধারায় গাফিলতির কারণে অনিচ্ছাকৃত হত্যার মামলা করেছে পুলিশ। যে পুলিশ কথায় কথায় প্রায় রোজই কোনও না কোনও শ্রমিকের নামে খুন, গ্যাংস্টার, রাজদ্রোহ, সশ্রম কারাবাস জাতীয় মামলা করে সেই পুলিশ-প্রশাসন মালিক ও তার চামচাদের প্রতি কত উদার!

এই ঘটনায় রাজ্য সরকার মৃত শ্রমিকদের পরিবার পিছু ৫ লাখ টাকা ক্ষতিপুরণ ও আহতদের জন্য ১ লাখ টাকা ক্ষতিপুরণ ঘোষণা করেছে। কিন্তু যে শ্রমিকরা সারা জীবনের জন্য পঙ্গু হয়ে গেলেন তারা ১ লাখ টাকা নিয়ে কী করবেন!

২২ মার্চ রোহতকের এক কমরেডের থেকে খবর পেলাম যে ৮ জন ঝলসে গিয়ে আহত অবস্থায় পিজিআইতে ভর্তি, সরকার ও প্রশাসন তাঁদের কোনও খবর বা চিকিৎসার দায়ও নিচ্ছে না। শুধু ঘোষণা করেই খালাস। একজন শ্রমিকের অবস্থা খুব সংকট জনক। তাঁকে পিজিআই রোহতক থেকে দিল্লির সফদরজং হাসপাতালে ভর্তির জন্য রেফার করা হয়েছে।

এই হল রাই শিল্পাঞ্চলে কারখানার হাল ও শ্রমিকের কাজের পরিবেশের হকিকত। এই তথ্য থেকে দিনের আলোর মত পরিষ্কার হয় যে শ্রমিকদের এই মৃত্যু কোনও নিছক দুর্ঘটনা নয়। মালিকের মুনাফার লোভ দ্বারা চালিত ব্যবস্থা জেনেবুঝে এই শ্রমিকদের হত্যা করেছে।

[তথ্যানুসন্ধান টিমের সদস্য ছিলেন নাগরিক সংবাদপত্রের তরফে নগেন্দ্র, জন সংঘর্ষ মঞ্চ হরিয়ানার সোমনাথ ও মেহের সিং, ও মজদুর পত্রিকার তরফে রবিশংকর।]