विषयः टेड यूनियन पर प्रतिबंध और मजदूर आंदोलन की चुनौतियां

(संदर्भः ’मजदूर संगठन समिति‘ पर झारखंड सरकार द्वारा प्रतिबंध)

दिनांक और समयः 9 फरवरी 2018,षाम 5.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक

स्थानः गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली

आयोजकः मजदूर एकता मंच, ओखला फेज-1, डी-98, इंद्रा कैंप, कल्याण विहार, नई दिल्ली

साथियो,

पिछले चंद सालों में नीति, कानून, अध्यादेश और संशोधनों आदि का सहारा लेकर कंेद्र और विभिन्न राज्य की सरकारों और साथ ही फासीवादी नीति पर चल रही पार्टियों और उनके संगठनों आदि द्वारा मजदूर वर्ग और आम जनता पर अभूतपूर्व हमला हुआ है, ….और यह बढ़ता ही जा रहा है। मजदूर वर्ग फैक्टरी दुर्घटना से लेकर बेरोजगारी और भूख से मरने के लिए विवश होता जा रहा है। फैक्टरी मालिक बेरोकटोक मुनाफा की हवस में मजदूरों को गुलामों सी बदतर जिंदगी जीने और मरने के लिए विवश कर रहे हैं। पुलिस, प्रशासन, सत्ताधारी पार्टियों के नेता मजदूरों के श्रम की लूट के भागीदार बने हुए हैं। हाल ही में बवाना जैसी उद्योगिक हत्याकांड में मजदूरों की मौत पर दमनकारी ताकतें न सिर्फ राजनीति की रोटियां सेंकने में व्यस्त हो जाते हैं बल्कि गुनाहगारों को बचाने के लिए वायदों का जाल बिछा देते हैं। इनके खिलाफ जब मजदूरों की गोलबंदी शुरू हो जाती है तब उस गोलबंदी, संगठन या सक्रिय मजदूर नेता को असामाजिक तत्व, भड़काने वाला, लोकशांति भंग करने ….और यहां तक कि देशद्रोही तक करार दिया जाने लगता है। ऐसे संगठनों और नेतृत्व पर पुलिस, गुप्तचरों से लेकर स्थनीय गुंडो, बाउंसरों की पहरेदारी बढ़ जाती है। फैक्टरी मालिकों द्वारा ऐसे मजदूरों की छंटनी कर दी जाती है। पुलिस द्वारा उनके उपर आपराधिक मामले दर्ज कर दिये जाते हैं। गुड़गांव के मारुती सुजुकी फैक्टरी में एक प्रबंधक की रहस्यमय स्थितियों हुई मौत के बदले में सैकड़ों मजदूरों को जेल भेज दिया गया, बड़ी संख्या में मजदूरों को जमानता पर रिहा करने के बजाय जेल में रखा गया और बाद में सत्र न्यायाधीश ने 13 मजदूरों को बामशक्कत आजीवन कारावास दे दिया। हाल ही दिसम्बर 2018 में झारखंड राज्य में एक पंजीकृत मजदूर संगठन ‘मजदूर संगठन समिति’ को ‘लोकशांति भंग करने और राज्य व्यवस्था बनाये रखने’ के नाम पर अध्यादेश जारी कर उसे प्रतिबंधित कर दिया गया।

यह बात सभी लोगों को पता है कि अपने देश में मजदूरों का मुख्य हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। लेकिन जो मजदूर संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं वे संगठित हों, ऐसा नहीं है। इस क्षेत्र का मुख्य हिस्सा पंजीकृत या गैरपंजीकृत मजदूर यूनियनों में संगठित नहीं हो पाया है। दिल्ली के बाहरी इलाका जैसे बवाना का उद्योगिक क्षेत्र में लगभग 6 लाख मजदूर काम करते और रहते हैं। ज्यादातर मजदूर घोषित न्यूनतम मजदूरी के आधा से भी कम पर अमानवीय हालात में तयशुदा काम के घंटे से ज्यादा देर तक काम करते हैं। फैक्टरी मालिक उन्हें गेट पर ताला लगाकर, बिना हाजिरी रजिस्टर आदि के साथ काम कराता है। इस इलाके में मजदूर यूनियन अत्यंत कम हैं और जो यूनियनें हैं उनके सदस्यता भी नाममात्र की है। बवाना उद्योगिक इलाके की हाल में मीडिया द्वार दी गई खबरों से पता चलता है कि वहां आगजनी और दुघटनाएं आमबात है जिसमें मजदूरों का घायल होना और मरना रोजमर्रा की घटना जैसा है। यह परिदृश्य दिल्ली और एनसीआर में कहीं भी देखा जा सकता है। इस परिदृश्य को चेन्नई, अहमदाबाद से लेकर झारखंड के कोयला खदानों तक में देखा जा सकता है। यह देश के मजदूरों की आम हालात है। इसके पीछे एक बड़ा कारण मजदूर के अधिकांश हिस्से का असंगठित बने रहना है। और, संगठित होते मजदूरों को पुलिस, प्रशासन, फैक्टरी मालिक और ट्रेड यूनियन एक्ट के कानूनों, प्रावधानों और श्रम विभागों द्वारो अघोषित रूप से यूनियन बनाने पर रोक लगा देने से भी मजदूर संगठित नहीं हो पा रहा है। जो यूनियनें रजिस्टर्ड हैं, उन पर विभिन्न तरह के दबावों और समझौतों में काम कराने का मानों स्वीकृत प्रचलन सा बन गया है।

यदि मजदूर वर्ग संगठित नहीं है, उसके संगठन को प्रतिबंधित किया जा रहा हो, संगठन बनाने के अधिकार पर हमला किया जा रहा हो तब यह बात साफ है कि पूंजी के मुनाफा की हवस को पूरा करने के लिए खुलकर हमला किया जा रहा है। देश की लगभग तिहाई आबादी जो देश की कुल संपदा का बहुलांश पैदा करता है, उसे संगठन, अधिकार, न्यूनतम मजदूरी और सुरक्षा से बंचित करने का अर्थ है एक नागरिक जीवन से बाहर कर देना। यही स्थिति खेत मजदूरों, गरीब और मध्यम किसानों, आदिवासी, महिला और युवाओं की बनी हुई है। देश में एक नागरिक जीवन को खत्म कर फासीवाद के मंसूबे पर चलने वाले संगठनों और पाटिर्यों को, इनके संरक्षण में चलने वाले ‘मेक इन इंडिया’ के जिंदल, अडानियों को खुली छूट है।

इस हालात में यह जरूरी है कि हम इस मसले पर परिचर्चा करें। एक पंजीकृत टेªड यूनियन ‘मजदूर संगठन समिति’ पर प्रतिबंध लगाने की राजनीति पर बात करें। बवाना उद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के जलकर मर जाने और इसके पहले इसी तरह की सैकड़ों घटनाएं हो चुकी है, को रोकने के लिए मजदूरों को संगठित करने के मसले पर इकठ्ठा हों और चुनौतियों के मद्देनजर सामुहिक प्रयास की संभावनाओं पर बात करें। और, यदि संभव है तो आगामी कार्यक्रम का भी निर्णय लें।

इस पत्र के साथ हम कुछ मैटर दे रहे हैं-

1. ‘मजदूर संगठन समिति’ को प्रतिबंधित करने वाला झारखंड राज्य आदेश

2. ‘मजदूर संगठन समित’ द्वारा जारी किया गया पर्चा

3. दिल्ली में विभिन्न संगठनों द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति

4. बवाना उद्योगिक क्षेत्र की फैक्टरी में आग लगने पर मजदूरों की हुई मौतों पर एक प्राथमिकि रिपोर्ट

आयोजकः

अंजनी कुमार, मजदूर एकता मंच, दिल्ली
संपर्कः अंजनी कुमार, 099190972924, जयगोबिन्द 08802903407

MSS- Press Note.doc

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